Patna: केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह की पहल से बिहार और झारखंड के बीच 25 वर्षों से लंबित सोन नद जल बंटवारे का विवाद आज समाप्त हो गया. दिल्ली में दोनों राज्यों के बीच समझौता ज्ञापन MOU पर औपचारिक हस्ताक्षर किए गए. नए समझौते के तहत बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2.00 MAF जल आवंटित किया गया है. MOU पर हस्ताक्षर के अवसर पर केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह, केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री सी०आर० पाटिल, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, उप मुख्यमंत्री-सह-जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी सहित दोनों राज्यों और केंद्र के वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित थे. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस ऐतिहासिक समझौते के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के प्रति विशेष आभार जताया. “उनके सक्रिय प्रयास, निरंतर संवाद और प्रभावी मध्यस्थता के कारण वर्षों से लंबित जटिल विषय का समाधान संभव हो सका. यह केवल जल बंटवारे का समझौता नहीं, बल्कि बिहार और झारखंड के बीच सहयोग, विश्वास और साझा विकास का नया अध्याय है.”
क्या था 25 साल पुराना विवाद?
मुख्यमंत्री ने बताया कि 1973 के बाणसागर समझौते के तहत सोन नद के कुल 14.25 MAF जल में से MP को 5.25 MAF, UP को 1.25 MAF और तत्कालीन अविभाजित बिहार को 7.75 MAF जल मिला था. वर्ष 2000 में झारखंड राज्य बनने के बाद अविभाजित बिहार के 7.75 MAF के बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों में विवाद शुरू हुआ. 10 जुलाई 2025 को रांची में गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की 27वीं बैठक में सहमति बनी थी. उसी के आधार पर आज अंतिम MOU पर दस्तखत हुए. मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे दक्षिण बिहार और झारखंड के पठारी एवं सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं का विस्तार होगा. पेयजल संकट कम होगा. औद्योगिक विकास को नई गति मिलेगी. दोनों राज्यों की दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित होगी.
सोन-फल्गु जोड़ो परियोजना और गयाजी को लाभ
समझौते के बाद जलाशय निर्माण और सोन नद को फल्गु नदी से जोड़ने की प्रस्तावित परियोजनाओं पर तेजी से काम होगा. इससे गयाजी सहित दक्षिण बिहार के कई क्षेत्रों में जल उपलब्धता बढ़ेगी. फल्गु नदी में पर्याप्त जल रहने से पितृपक्ष मेले के दौरान देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को तर्पण एवं पिंडदान में भी सुविधा मिलेगी. मुख्यमंत्री ने कहा कि सोन नद गंगा की प्रमुख दक्षिणी सहायक नदी है. यह समझौता पूरे पूर्वी भारत के जल प्रबंधन और क्षेत्रीय विकास के लिए दूरगामी महत्व रखता है.
